hont ka jaayka bhi gaya aankh ki maykashi bhi gaii | होंठ का जायका भी गया आँख की मयकशी भी गई

  - Saahir

होंठ का जायका भी गया आँख की मयकशी भी गई
इक तेरे जाने के बाद इस रूह की सादगी भी गई

जो मेरा 'इश्क़ था उसकी शादी कहीं और तय हो चुकी
मैं मरा भी नहीं और मेरे हाथ से ज़िन्दगी भी गई

जल्दी से इक दिये को जला कर रखो रौशनी के लिए
रात से वैसे ही डरता हूँ उसपे ये चाँदनी भी गई

मैं परेशान हो जाता हूँ एक इस बात को सोचकर
पैसे खर्चे गए और मेरे हाथ से नौकरी भी गई

पेड़ों को काटने से हवा में खराबी तो आती ही है
धूप के तेज़ हो जाने से इस ज़मीं की नमी भी गई

  - Saahir

Ishq Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Saahir

As you were reading Shayari by Saahir

Similar Writers

our suggestion based on Saahir

Similar Moods

As you were reading Ishq Shayari Shayari